1959- चीन के खिलाफ अमेरिका ने उत्तराखंड में रखा था – परमाणु संयंत्र (nuclear plant)

Atalk Hindi – क्या आपको पता है? सन 1959 में अमेरिकन(American) एजेंसी सीआईए(CIA) के एजेंटों ने नंदाकोट(Nandakot) पर एक परमाणु संयंत्र(nuclear plant) रख दिया था। तब टोही उपग्रहो की परिकल्पना साकार नही हुई थी। इस परमाणु संयंत्र से चीन(china) पर नजर रखने की योजना थी। 1964 में अमेरिकी सिनेटर रिचर्ड औटियर ने भारतीय दूतावास के जरिये भारत सरकार को आगाह किया कि देश की जनता के हित में इस उपकरण की खोज करना बहुत जरूरी है। यदि इस यंत्र से परमाणु विकीरण होने लगा तो गंगा का पानी पीने वाले और नदी की मछलियां खाने वाले हर व्यक्ति को कैंसर जैसे भयानक रोग घेर लेंगे।



1959 में जब इस यंत्र को स्थापित किया जा रहा था, तब स्थानीय ग्रामीणों में इस यंत्र को ढोने की होड़ लगी हुई थी। दरअसल उन्हें बताया गया था कि यह यंत्र बर्फीली ठंड में भी गरमी पैदा करेगा। इस संयंत्र से उन्हें गरमी महसूस हो भी रही थी। दरअसल यह गरमी परमाणु संयंत्र में रेडियो आइसोटोप के विकीरण के कारण पैदा हो रही थी। चक्रवात के कारण इस यंत्र को वहीं छोड़ दिया गया। कुछ दिनो बाद बर्फ में यह उपकरण कही खो गया। उसके बाद एक और परमाणु संयंत्र नंदाकोट में  स्थापित किया गया। 1964 से 1968 के बीच सीआईए के एजेंटों नें नंदाकोट तथा नंदा देवी पर्वत पर सात अभियान किए। चार भारतीय पर्वतारोही इस अभियान में शामिल थे, जिन्हें बाद में अमेरिका ले जाया गया और उन्हंे अलास्का में प्रशिक्षण दिया गया।

  • बताया जाता है कि इन संयंत्रो को लेकर जाने वाले मजदूरों की विकीरण की वजह से वहीं गलकर मौत हो गई। हालांकि इस बात की पुष्टि कोई नहीं करता है। तब न तो आज की तरह मीडिया इतना प्रभावशाली था और न ही मानवाधिकार की बात करने वाला कोई था।
  • एक दैनिक समाचार पत्र में इस संबंध में 9 मई 1985 को इस संबंध में एक लेख प्रकांिशत हुआ। इस घटना को अखबार में प्रकाशित होेने में 26 साल लग गए।
  • रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्थर कंपिलिन ने तभी कह दिया था कि यदि इन उपकरणोें को खोजा नहीं गया तो लाखों लोगों को परमाणु विकीरण से जूझना पडे़गा। यह परमाणु बम के हमले से भी अधिक खतरनाक होगा। सीक्यांग क्षेत्र में चीनी परमाणु परीक्षण की जासूसी करने के लिए इस यंत्र की स्थापना की गई थी।

नंदाकोट पर रखा गया यह उपकरण नाभिकीय विद्युत सिद्धांत के आधार पर बनाया गया है।

  • प्लूटोनियम 238 की कई छड़ों से युक्त इस यंत्र से 75 वर्ष तक बिजली प्राप्त की जा सकती है। इसका तापमान कभी-कभी 800 डिग्री फारेनहाइड तक बढ़ जाता है।20 मिमी मोटे टेटलम धातु से बने कैप्सूल में जिसके बाहर लगभग 4 इंच लंबा निकिल का खोल है। जो ग्रेनाइट के आवरण से ढका है।
  • यह उपकरण अल्यूमिनियम के अड़ाकार खोल में बंद है। इसकी ऊंचाई 113 इंच तथा वजन 38 पौड़ है। संपूर्ण यंत्र का वजन 135 पौंड़ है। इन दोनो परमाणु संयंत्रों की अभी तक खोज नहीं की जा सकी है। ये संयंत्र कभी भी परमाणु विकीरण का कारण बन सकते है। इससे नंदाकिनी और अलकनंदा नदियों का पानी पीने वाले सभी जीव जंतु और मनुष्य किस भयानक खतरे मे पड़ जायेगे इसकी कल्पना ही की जा सकती है।

पौडी़ गढ़वाल क्षेत्र के सासंद सतपाल महाराज नंदा देवी पर्वत पर परमाणु संयंत्र के गायब होने का यह मामला संसद में उठा चुके है। उन्होने भविष्य में होने वाले विकीरण पर चिंता भी जताई है। सरकार से आग्रह किया है कि नंदा पर्वत पर रखे गये परमाणु संयंत्रों की खोज कि जाए और उन्हे वहां से हटाया जाए। महाराज कहते हैं कि उन्हें अपने सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिले। दरअसल यह विदेश मंत्रालय से जुडा़ मामला है, इसलिए इस मामले में कोई सरकारी महकमा तथा अफसर कुछ भी बोलने को तैयार नही है। इससे भारत -चीन के संबधो पर सीधे प्रभाव प्रभाव पडता है। इसलिए इस मामले मे सरकार भी कुछ बोलने को तैयार नही है।े

(यह लेख नंदा राजजात पुस्तक से लिया गया है )