भगवद गीता में आत्मा का स्वरूप – atalk

bhagwat geeta aatma ka swaroop

  “श्रीमद् भगवद् गीता में आत्मा का स्वरूप”

श्रीमद् भगवद् गीता के अनुसार आत्मा का स्वरूप कुछ इस प्रकार है!

  • “न जायते मृयते वा कदाचिन्

             नायं भूत्वा भविता वा न भूयः!

             अजो नित्यः शाश्र्वतोयं पुराणो

             न हन्यते हन्यमाने शरीरे !!

यह आत्मा किसी काल में न तो जन्मता है,और न मरता है, तथा न यह उत्पन्न होकर फिर जन्म लेने वाला है,क्योंकि यह नित्य,अजन्मा,पुरातन,सनातन है,शरीर के मर जाने पर भी यह आत्मा नहीं मरती!

इस श्लोक तथा अर्थ के माध्यम से आत्मा के स्वरूप को सूक्ष्मतया समझाया गया है!

  • गीता में आत्मा के स्वरूप को अत्यंत विलक्षण,सर्वोत्कृष्ट,त्रिविद्परिच्छेदशून्य,सत्ज्ञान,आनंदरूप, सजाति,विजाति,स्वगतभेदशून्य,निर्गुण, निर्विकार, शुद्ध चैतन्य,आत्मा स्वरूप इस रूप से प्रतिपादित किया गया है!
  • आत्मा का न जन्म होता है, न मृत्यु होती है,निर्गुण, निर्विकार, निर्विशेष, सविशेष,के भेद से आत्म चैतन्य दो प्रकार का होता है!निर्गुण, निर्विशेष, निर्विकार शुद्ध चैतन्य ब्रह्म ही त्रिगुणात्मिकाभाव रूप माया के द्वारा सविशेष हो जाता है, जैसा कि उपनिषद में कहा गया है-‘द्वावेवा ब्राह्मणो रूपं,मुरतं च मुर्तमेव च”
  • श्रीमद् भगवद्गीता में भी श्श्रीकृष्ण भगवान द्वारा आत्मा का स्वरूप
  • वासांसि जीर्णानि यथा विहाय,

नवानि गृह्णाति नरो पराणि!

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-

न्यन्यानि संयाति नवानि देही!!

अर्थ-जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है, ठीक वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नयें शरीरों को धारण करती है!

इस प्रकार यह आत्मचैतन्य मायोपाहित के कारण ईश्वर कहलाता है, वही अविद्यावच्छिन्न होने के कारण जीव हो जाता है, उपादि भेद के कारण एक ही आत्म चैतन्य ईश्वर जीव रूप होकर अनेकधा में विभाषित होता है!

जैसे-एक ही महाकाश घटादि उपादि भेद से घटाकाश, मठाकाश,घोराकाश इत्यादि आकाश का भेद हो जाता है, जबकि वास्तविकता में भेद नहीं है,

                                   वह आत्म चैतन्य ब्रह्म कर्ता न होता हुआ भी ,मायोपादि के कारण कर्ता की तरह प्रतीत होने लगता है, कहा भी गया है की

“न कर्तृत्वं न कर्माणि,तथापि सृजति प्रभू”!

(न वह कर्ता हैं न कर्म फिर भी प्रभू पृथ्वी का सृजन कर रहें हैं)

इस प्रकार इस आत्मचैतन्य के होने में श्रुति आदि प्रमाण दृष्ट हैं,आत्मा के अस्तित्व के होने में तत्व प्रदीपिकार चित्तसुखाचार्य जी ने कहा है की-

चेतनात्वाद् कर्मत्वात्,स्वयं ज्योति रितिश्रुते !

आत्मनः स्व प्रकाशत्वं, कोनिवार्यितुं क्षमा !!

इस प्रकार उपर्युक्त दृष्टांतों के द्वारा यह सिद्ध होता है कि!आत्मा सिद्ध है,चेतन है, कर्मरहित है,एवं स्वयं प्रकाशमान है, उसी के प्रकाश से सूर्य चंद्रादि सम्पूर्ण आकाशादि मण्डलस्थ नक्षत्रादि प्रकाशित हो रहें हैं!

“तस्य भाषा सर्वं इदं विभाति”इस मंत्र के द्वारा यह सिद्ध होता है वह आत्मचैतन्य अनुभूति स्वरूप है, अनुभूति का तात्पर्य ज्ञान से है,

अर्थात्-आत्म स्वरूपः आत्म चैतन्यः!!

-आचार्य पंकज जोशी